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Vijaykumar Dave

Vijaykumar Dave
My own Hindi Gujarati Poems and creative writings is published here. I am interested in Hindi Gujarati Literature, Poems, Computers, Programming....

Articles

डा. प्रभात टंडन जी की टिप्पणी
2008-03-31 22:53:00
मेरी कविता मृत्यु पर डा. प्रभात टंडन जी ने टिप्पणी करते हुए एक सुंदर काव्य ही सुना दिया.. यह काव्य आप सभी पाठकों के लिए ... धन्यवाद डा. टंडन जी ... Dr Prabhat Tandon said...एक अदद उधडी सी जिंदगी टांकते-न-टांकते आगे यों चल देने मे क्या तुक ? रोना ही रोना आपा खोना रोना-कल्पना अकारथ है घुटे-२ जीना केवल विष पीना भटकना अकारत है सार्थकता कुछ तो संजोये है - चिरि-चुरमुन की --चुक-चुक-चिक चुक-चुक आगे यों चल देने मे क्या ...
मृत्यु
2008-01-16 09:25:00
मृत्युमरघट परबरगद के पेड़ के नीचेबैठा हुआ सन्नाटामुझे सदियों से कोसता रहा है ।मैं अभी भी उठा नहीं हूँउसने मुझे आवाज दे -दे करकंठ में पहन ली है विषमाला ।मैं नितांत अकेलापन चाहता हूँमैं अकेला रहना चाहता हूँमगर उसी बरगद पर बैठा चमगादडसन्नाटे को विषपान करते हुए देखकरचिल्ला रहा है कब का ।मुआ ! सोता भी नहींसोने देता भी नहीं,जब किमुझे गाढी नींद आ रही हैसू - सू करते हुए सन्नाटे में ।
श्री नरेन्द्र मोदी की कार्य
2007-12-29 21:47:00
श्री नरेन्द्र मोदी की कार्यकर्ताओं को सीख -जब मोदीजी की अश्रु बहने लगे ...अपतिम सफलता के बाद गांधीनगर के टाउनहोल में नवनिर्वाचित विधानसभा सदस्यों और कार्यकर्ताओं को श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया संबोधन ... जिसमें बात करते करते श्री मोदी जी की आंख से अश्रु बहने लगे ...वास्तव में, भिष्म पितामह ने बाणशय्या पर युधिष्ठिर को जो सीख दी थी, उसकी याद ताजा हो गई.पूरा वक्तव्य चार हिस्सों मे...
एक आशा
2007-12-29 09:35:00
सदियों की तलाशपूरी हुई इस जनम में ...तुझे ढूंढकर .अब शुरू हो रही हैइंतजार की घडियां ...पूर्ण होने में अभी देर हैजन्माजन्म का चक्र .इंतज़ार के बादमिलन भीसदियों तक .
कुछ पंक्तियां ... जो अभी पूरी ह
2007-12-15 11:09:00
न जाने कितनी बात हुईन जाने कितनी किश्तों में* * * * *तमाशा देखनेवालो ! बजाओ एक-दो ताली,यहां धरती के होठों पर छायी है हरियाली;भिगोती हुई सूरज के किरनों की बौछारें,बिछा देती है अवनि के मधूर वक्ष पर लाली.* * * * *शाम के ढलते हुए सूरज को मैंने देखा,एक आह निकली और हो गया सवेरा.* * * * *जमाने भर की यादों को समेटा जा रहा दिल में,तुम्हारे साथ गुजरे जो, वही बस याद है मुझको.* * * * *
एक घंटे की मुलाकात
2007-12-06 07:48:00
एक घंटे की मुलाकातइतनी बोझिल होगीयह आज ही पाया.तुम चले गये ...हम पर्वतों पर चढे थे,मैं कहां समंदर के किनारे आ पहुंचा ?हमने छू ली थी ऊंचाई चट्टानों की,मैं कहां घिर गया हवा के झोंकों में ?हवा के हरेक झोंके के स्पर्श सेएक तीर निकल जाता है आरपार .हरबार लबों पर आ जाता है,तुम्हारा नाम .हर पल एक-एक साल की तरह बीतता हैजब रात को तेरी यादों का झोंकाछू लेता है मुझे .बुदबुदों की तरह हर लम्हा एक घाव दे क...
छायी है घटा
2007-11-26 11:54:00
छायी है घटा तो फिर बरसानातेरी महेरबानी, ना तरसाना .अ़ब आकर दिखा जा तेरी अदाशरमाना, अंगडाना, बल खाना.जीवन की घनी-सी गलियों मेंना छोड के जाना, ना तड्पाना.होले से चली है ठंडी पवनआंखोंमें भरकर लहराना.बारिश के सुहाने मौसम मेंतुम मेरी तरस तो छिपा जाना.
मेरी गुजराती कविताएं
2007-11-24 20:53:00
नमस्कार ...आप मेरी गुजराती कविताओं का आस्वाद नीचे दर्शित लींक पर क्लिक करके उठा सकते हैं...आपके प्रोत्साहन और प्रेरणा से मेरे सृजन कार्य को अवश्य सहाय मिलेगी...http://gujaratikavit ayen.blogspot.com/विजयकुम र दवे.
आओ ! फिर से जियें हम
2007-11-15 08:51:00
आओ ! फिर से जियें हमआओ ! फिर से जियें हम,एकदूसरे को एकदूसरे में समेटकरखोज निकालेंनयी राह परनयी-सी मझिल।झिल भरकर यादों कीबहती धारा बन जायें हम,आऒ, एक नया शहर बसायें हम।पंख लगाकर छूएं आसमां ...निर्मल, निश्चल होकरआऒ, डूबेंएकसाथ मेंसमंदर के गहरे तल में।हाथ पसारें,बांह डालें, चलें डगर पर एकदूजे का विश्वास लिये हम।आऒ - फिर से जियें हम.
धन्यवाद.... १००० मुलाकातियों
2007-11-12 09:13:00
इस ब्लोग पर मुलाकातियों की संख्या १००० के ऊपर पहूंच गई है...आप सभी का मैं रूणी हूं ...आभार ...-------------------------------------- --------------------------------------Vis itors to http://vijaykumardave.blogspot.com (dates below)Navigation: Map with smaller clustrs Maps Archive Notes Full Map Key distance in which individuals are clusteredDot sizes: = 1,000+ = 100 - 999 = 10 - 99 = 1 - 9 visitsRunning total of visits to the above URL since 26 May 2007: 1,002Total since archive, i.e. 26 May 2007 - present: 1,002 distance in which individuals are clusteredDot sizes: = 1,000+ = 100 - 999 = 10 - 99 = 1 - 9 visitsRunning total of visits to the above URL since 26 May 2007: 1,002Total since archive, i.e. 26 May 2007 - present: 1,002
तीन कविताएं
2007-10-17 08:31:00
तीन कविताएं(१)मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद मेंतेरी तस्वीर बंद है .तेरी हरएक तस्वीर को मैं झांका करता हूंचोरी-चोरी, चूपके-चूपके ।मेरे होठों पर कई दिनों सेतितली बैठने नहीं आयी ।मेरी आंखों में कई दिनों सेएक कटी-पतंग उड रही है ।मेरे कानों में निरव स्वर नेझंकार देना छोड दिया है ।मेरी अंगूलियों ने स्पर्श संवेदनागंवा दी है ।मैं एक बुत-सा बन गया हूं -मुझे पारसमणि की तलाश है ।...
मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाक
2007-08-17 09:44:00
मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये मैं यहां मेरे मार्गदर्शक मित्र कविवर श्री सुरेन्द्र कडिया जी की कुछ रचनाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ...इन कविताओं पर आपका प्रतिभाव सादर निमंत्रित है...श्री सुरेन्द्र कडिया जी से आप kadiya@sbs.co.in पर संपर्क कर सकते हैं ...ગઝલ- સુરેન્દ્ર કડિયાફૂલોની ફરશ પર પસીનો ઠર્યો છેકહે છે, હવાઓએ ઓચ્છવ કર્યો છે.ફરી એની સામે અરીસો ધર્યો છેફરી એક તાજો સિતારો ખર્યો છે.મુબ...
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2007-08-01 00:25:00
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समंदर में
2007-07-26 13:02:00
कभी कस्ती, कभी तूफ़ां, कभी लहरें समंदर में;कई यादें, कई आंसू, कई चहरे समंदर में.वहां था पानी ही पानी, नहीं शबनम की दो बुंदें;अरे! आश्चर्य! कोई दे रहा पहरे समंदर में.मत छेड तू उसको, वह पीछे पीछे दौडेगा;अरे! ओ डूब जाने के कई खतरे समंदर में.कितनी सदियों से वह चुपचाप है बैठा;न जाने कौन है जो है, इतने गहरे समंदर में.अभी तो सिर्फ़ छुआ था, मुझे वह मेरे बिस्तर पर;तभी से दौडती है उठती हुई लहरें समंदर में.
डाक पेटी की सिहरन
2007-07-06 10:16:00
अंधियारी गली के किनारे खडेएक लैंप पोस्ट पर टंगी हुईडाक पेटी में -हररोज डाला करता हूँ मैं -एक ख़त।मेरा ख़त अन्दर जाते हीडाक पेटी के बदन में सिहरन उठती है,न जाने क्यों ?एक दिन मैंने पूछा -"तू क्यों सिहर उठती हो मेरे ख़त डालने पर ?"बोली -" उत्तर न मिलने पर भीख़त डाले जा रहे हो ! -सिहर न उठू तो क्या करूं ?तूने मुझे वन वे जो बना रखा है ।"
बिदाई पर
2007-07-06 10:02:00
कभी कभारएक लम्हाछूट जाता है हमारे पीछे हीदीवारों पर लिखा तोमिटा सकते हैं हम लेकिनदीवारों के जिस्म में लिखाकहॉ पोछ सकते हैं कभी !
याद
2007-06-22 13:41:00
कब तक ढोते रहोगे तुममेरी यादों को ?कितने क्षण ?- लाखों - करोडों क्षण ?ठीक है, याद ढोना नहीं,- याद करना नहीं।परंतुइतन जरूर करनाभूल मत जाना.
आओ चले कहीं दूर
2007-06-15 11:40:00
आओ चले कहीं दूरचले सपनों के गांव मेंखेलें चलो हाथ पकड़करजरनोँ की मस्ती सेघूमें चलों साथ चलकरपहाडों की बस्ती मेंवादियों को हम चूमेंचलो साथ बागों मेंआओ चले कहीं दूरचले सपनो के गांव मेंतू जो साथ चल दे मेरेचल देंगी ये राहेंतू जो रहे पास मेरेखिल उठेंगी बहारेंडाले हम डेरा तेरीनजरों की छांव मेंआओ चले कहीं दूरचले सपनों के गांव में
आज रात मुजे तेरी बहुत याद आ र
2007-05-28 12:47:00
अभी अभी मेरे वक्ष से कुछ निकला है।मैं उफ भी न कर सका किवह मेरे सामने आकर बैठ गया।दर्द का जिस्म से ईस तरह अलग हो जानाहर एक रात की बात नहीं है.कभार तो मैंने ही बहुत कोशिशें की हैउसे बाहर निकाल खिंचने कीपर वह ईस तरह निकल आयेगाकभी सोचा ही नहीं था.आज रात मुजे तेरी बहुत याद आ रही है.
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